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शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।

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मन से उतरे हुए लोग, सामने भी बैठ जाए तो नज़र नहीं आते....
 मै गुल्लक तोड़कर वापस गया जब,  वो गुडिया और मंहगी हो गई थी...