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देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से,
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से।

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मन से उतरे हुए लोग, सामने भी बैठ जाए तो नज़र नहीं आते....
 मै गुल्लक तोड़कर वापस गया जब,  वो गुडिया और मंहगी हो गई थी...