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उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गए, दो इंतिज़ार में।

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मन से उतरे हुए लोग, सामने भी बैठ जाए तो नज़र नहीं आते....
 मै गुल्लक तोड़कर वापस गया जब,  वो गुडिया और मंहगी हो गई थी...